Monday, January 9, 2017

A Story of Traveller


इन्टरनेट युग में भागते-दौड़ते हमारे पास एक कहानी एअरपोर्ट की भी आती रहती है। शायद विदेशों में कहीं की कहानी है, भारत की होती तो शायद किस्से में बस स्टॉप या स्टेशन होता। कहानी कुछ यूँ है कि एक व्यक्ति जब एअरपोर्ट पहुंचा तो फ्लाइट में थोड़ी देर थी। समय काटने के लिए और कुछ भूख मिटने के लिए उसने बिस्कुट का एक पैकेट ले लिया। पैसे चुकाए और एक बेंच पर जा बैठा। बगल में थोड़ी दूर पे एक वृद्धा बैठी थी, उसे देखकर सभ्यतावश मुस्कुराया। थोड़ी देर तो इधर उधर आते जाते लोगों को देखकर, अखबार पढ़कर उसने समय काटा, फिर बगल में बेंच पे रखा पैकेट खोला और एक बिस्कुट खाने लगा।

उसकी देखा देखी उसके बगल में जो वृद्धा थी, उसने भी एक बिस्कुट, पैकेट से ले लिया। व्यक्ति का ध्यान गया, लेकिन उसने सोचा चलो बूढ़ी ने एक बिस्कुट ले भी लिया तो क्या ? जब उसने दूसरा बिस्कुट लिया तो वृद्धा ने फिर एक बिस्कुट उठा लिया ! आदमी ने सोचा कैसी औरत है ! किसी अनजान के पैकेट से लेकर बिस्कुट खाए जा रही है। खैर बोला वो फिर भी कुछ नहीं। थोड़ी देर बाद जब उसने तीसरा बिस्कुट लिया तो वृद्धा ने फिर एक उठा लिया। एअरपोर्ट से शायद कीमत से कई गुना ज्यादा में ही खरीदा होगा तो अब आदमी को गुस्सा आने लगा। अगला बिस्कुट उठाते वक्त उसने पैकेट थोड़ा अपनी तरफ खीच भी लिया। मगर बुढ़िया थी कि उसने पैकेट वापिस अपनी तरफ खीचा और फिर एक बिस्कुट उठा लिया !

सभ्य व्यक्ति था, हवाई सफ़र कर रहा था तो दो चार बिस्कुट के लिए बुढ़िया को कुछ कहने का उसका मन भी नहीं था। मगर कुछ नाराज सी शक्ल बनाते हुए उसने घूर के वृद्धा को घूर के देखा और एक और बिस्कुट पैकेट से उठा लिया। मगर वृद्धा भी अजीब सी ही थी ! उसने भी आदमी को घूर के देखा, और आखरी बिस्कुट भी उठा के खा लिया। तबतक उस व्यक्ति के जहाज की घोषणा हुई। तो बिस्कुट खा जाने वाली बुढ़िया से खीजा हुआ व्यक्ति अपना बैग संभालता जाने को हुआ। जैसे ही उसने अपना बैग उठाया तो कुछ पोलीथिन खड़कने की आवाज सी हुई। जैसे ही उसने बैग में देखा तो देखता क्या है, अपना बिस्कुट का पैकेट खरीदकर तो उसने बैग में रख लिया था !

इतनी देर से जिसे वो अपना समझ रहा था वो उसका था ही नहीं। किसी और के बिस्कुट के पैकेट को अपना समझ कर वो खाए जा रहा था ! ऊपर से किसी और के ले लेने पर नाराज और दुखी भी हो रहा था।

जब आप भगवद्गीता देखेंगे तो आपको यही नजर आएगा। चूँकि आप भगवद्गीता को एक साक्षी-एक श्रोता की तरह लेते हैं, आप उसके भाग नहीं हैं। बेचारे अर्जुन जो थे, वो महाभारत के युद्ध में सम्मिलित थे, इसके भाग थे इसलिए उनके लिए ये अपना-पराया एक बड़ी समस्या हो गई ! ये वैसा ही है जैसे आपसे मिलने पर, कोई बच्चा अपनी बड़ी सी समस्या आपको सुनाने आये। उसके लिए पूरी दुनियां की वो सबसे बड़ी दिक्कत है, आप बाहर से देख रहे है तो आपको मामूली लगती है। अपनी सबसे कठिन समस्या लोगों को बता दें तो बाहर से देखने वालों को आसान लगेगी, आप उसमें भागीदार हैं तो आपके लिए कठिन है। इसे पहला अध्याय यानि अर्जुनविषाद योग कहते हैं। तो इस बार फिर से (धोखे से) हमने आपको गीता का पहला अध्याय पढ़ा डाला है।

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌ ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ (भगवद्गीता १:४५)

भावार्थ : ओह! कितने आश्चर्य की बात है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने प्रियजनों को मारने के लिए आतुर हो गए हैं। अपना क्या है, पराया क्या है, और युद्ध क्यों कर रहे हैं ? ये सारे सवाल ही अर्जुनविषादयोग का विषय हैं। प्रबंधन में कहते हैं, किसी समस्या से निपटने के लिए उसे पहले स्पष्ट परिभाषित करना जरूरी है। समस्या से निपटने के लिए अर्जुनविषादयोग में समस्या और परिस्थिति को परिभाषित किया गया है।

बाकी फिर से याद दिला दें कि ये नर्सरी के स्तर का है और ठीक से जानने के लिए आपको खुद पढ़ना होगा।

(इस कहानी को ऑडियो की तरह डाउनलोड करने के लिए लिंक पे जाएँ : http://www.baklol.co/arambh-arjun-vishad-yog-gita-chapter1/)
Written By-  @Anand Kumar
https://www.facebook.com/anandydr

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